HadeethEnc · 1.58.0
क्या बात है कि माहवारी वाली स्त्री छूटे हुए रोज़े बाद में रख लेती है, लेकिन छूटी हुई नमाज़ें बाद में नहीं पढ़ती? उन्होंने कहाः क्या तू हरूरिया है? मैंने कहाः नहीं, मैं हरूरिया तो नहीं हूँ, लेकिन पूछ्ना चाहती हूँ। तब उन्होंने कहाः हमें इस स्थिति से गुज़रना पड़ता, तो हमें छूटे हुए रोज़ों को बाद रख लेने का आदेश दिया जाता, लेकिन छूटी हुई नमाज़ों को बाद में पढ़ने का आदेश नहीं दिया जाता था।
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Hadeeth text
मुआज़ा कहती हैं कि मैंने आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) से पूछाः क्या बात है कि माहवारी वाली स्त्री छूटे हुए रोज़े बाद में रख लेती है, लेकिन छूटी हुई नमाज़ें बाद में नहीं पढ़ती? उन्होंने कहाः क्या तू हरूरिया है? मैंने कहाः नहीं, मैं हरूरिया तो नहीं हूँ, लेकिन पूछ्ना चाहती हूँ। तब उन्होंने कहाः हमें इस स्थिति से गुज़रना पड़ता, तो हमें छूटे हुए रोज़ों को बाद रख लेने का आदेश दिया जाता, लेकिन छूटी हुई नमाज़ों को बाद में पढ़ने का आदेश नहीं दिया जाता था।
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Explanation
मुआज़ा ने आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) से पूछा कि आख़िर क्या कारण है कि अल्लाह ने मासिक धर्म के दिनों में छूटे हुए रोज़ों को बाद में रख लेने आदेश दिया है, लेकिन इस अवधि में छूटी हुई नमाज़ों को बाद में पढ़ने का आदेश नहीं दिया, जबकि दोनों फ़र्ज़ इबादतें हैं, बल्कि नमाज़ रोज़े की तुलना में अधिक बड़ी इबादत है? चूँकि दोनों के बीच अंतर न करने का कठिनता पर आधारित निर्णय ख़्वारिज का है, इसलिए आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) ने उनसे कहा कि क्या तुम हरूरी अर्थात ख़ारिजी हो कि उन्हीं जैसी आस्था रखती हो और उन्हीं जैसी उग्रता दिखा रही हो? उन्होंने कहाः मैं हरूरी नहीं हूँ, मैं केवल जानने और मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए पूछ रही हूँ। यह सुन, आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) ने कहाः नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के ज़माने में हम माहवारी के दिनों से गुज़रते, तो रोज़ा और नमाज़ दोनों छोड़ देते, फिर आप हमें बाद में रोज़ा रख लेने का आदेश देते, लेकिन नमाज़ पढ़ने का आदेश नहीं देते। अगर ऐसा करना ज़रूरी होता, तो आप हमें ज़रूर आदेश देते और ख़ामोश नहीं रहते। एक तरह से वह कहना चाहती थीं कि हिकमत और हिदायत की बात यही है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के आदेशों का पालन किया जाए और आपकी ओर से निर्धारित सीमाओं को पार न किया जाए।
Attribution
[इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।]
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