افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم.
#11268[सह़ीह़]
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ऐ आइशा ! मेरी आंखें तो सो जाती हैं मगर मेरा दिल नहीं सोता।

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01

Hadeeth text

अबू सलमा बिन अब्दुर्रहमान से रिवायत है, वह बताते हैं कि उन्होंने आइशा -रज़ियल्लाहु अन्हा- से पूछा कि रमज़ान में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नमाज़ कैसी होती थी? उन्होंने फ़रमाया : “रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रमज़ान में और रमज़ान के अलावा दिनों में ग्यारह रकअत से ज़्यादा नहीं पढ़ते थे, पहली चार रकअतें ऐसी पढ़ते कि उनकी ख़ूबसूरती और लम्बाई के बारे में न पूछो और फिर आप चार रकअतें ऐसी ही पढ़ते कि उनकी ख़ूबसूरती और लम्बाई की हालत मत पूछो । फिर तीन रकअत पढ़ते थे ।” आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा फ़रमाती हैं कि मैंने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ! क्या आप वित्र पढ़ने से पहले सोते रहते हैं ? तो आपने फ़रमाया : “मेरी आंखें तो सो जाती हैं मगर मेरा दिल नहीं सोता।”
02

Explanation

इस बात से सब लोग अवगत थे कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- रमज़ान का महीना हो कि कोई और महीना, रात में उठकर नमाज़ें पढ़ा करते थे। यही कारण है कि अबू सलमा -रज़ियल्लाहु अनहु- ने रमज़ान की रातों में पढ़ी जाने वाली नमाज़ के बारे में पूछा कि रमज़ान में आपकी रात की नमाज़, राकतों की संख्या के मामले में अन्य महीनों की तरह ही होती थी या फिर कुछ अलग होती थी?
इसका उत्तर आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- ने यह दिया कि आपकी रमज़ान तथा अन्य महीनों की रात की नमाज़ के बीच कोई अंतर नहीं है। क्योंकि आप आम तौर पर ग्यारह रकात पढ़ा करते थे और इससे अधिक नहीं पढ़ते थे।
फिर उन्होंने अबू सलमा -रज़ियल्लाहु अनहु- को आपकी रात की नमाज़ की कैफ़ियत बताते हुए फ़रमाया : "पहले चार रकात पढ़ते" इसका मतलब यह है कि पहले दो रकात पढ़ने के बाद सलाम फेर देते और उसके बाद दो रकात पढ़कर सलाम फेरते। क्योंकि स्वयं आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- ने इस हदीस में संक्षिप्त रूप से कही गई बात की व्याख्या अपनी एक अन्य हदीस में कर दी है, जो सहीह मुस्लिम में मौजूद है। वह कहती हैं : "अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- इशा की नमाज़ पढ़ने के बाद से फ़ज़्र तक ग्यारह रकात पढ़ते थे। इस दौरान हर दो रकात के बीच सलाम फेरते थे और एक रकात वित्र पढ़ते थे।" जबकि एक अन्य हदीस में है : "रात की नमाज़ दो-दो रकात है।" यह हदीस सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम में वर्णित है।
"तुम उनकी सुन्दरता तथा लम्बाई के बारे में न पूछो।" यानी उनकी कैफ़ियत मत पूछो। वह श्रेष्ट क़िरात तथा क़याम, रुकू एवं सजदे की लम्बाई में बड़ी ही सुंदर एवं संपूर्ण हुआ करती थीं।
इसी तरह अंतिम चार रकातों को भी दो-दो रकात पढ़ा करते थे और श्रेष्ठ क़िरात तथा क़याम, रुकू एवं सजदे की लम्बाई में उनकी सुंदरता अद्भुत हुआ करती थी।
"फिर तीन रकात पढ़ते थे।" इन शब्दों का ज़ाहिर यह बताता है कि आप तीन रकात लगातार पढ़ते थे और उनके बीच में सलाम नहीं फेरते थे। लेकिन आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- की दूसरी रिवायत ने स्पष्ट कर दिया है कि आप दो रकात के बाद सलाम फेर देते थे और उसके बाद एक रकात वित्र पढ़ते थे। उस रिवायत के शब्द हैं : "आप हर दो रकात के बाद सलाम फेरते और एक रकात वित्र पढ़ते थे।" यह हदीस इस बात का प्रमाण है कि आप तीन रकात वित्र पढ़ते समय बीच में सलाम फेरते थे।
"आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा- फ़रमाती हैं कि मैंने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम! क्या आप वित्र पढ़ने से पहले सोते हैं?" यानी आप वित्र पढ़ने से पहले कैसे सोते हैं?
"तो आपने फ़रमाया : ऐ आइशा! मेरी आँखें तो सो जाती हैं, मगर मेरा दिल नहीं सोता।" इसका अर्थ यह है कि जिस तरह आपकी आँखें अनुपस्थित हो जाती हैं, उस तरह आपका दिल अनुस्थित नहीं होता। आप सब कुछ अनुभव तथा महसूस करते हैं। मसलन आपको सोने की अवस्था में भी समय का ध्यान तथा उसकी पहचान रहती थी। यही कारण है कि नबियों का स्वप्न वह्य हुआ करता था।

Attribution

[इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।]

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