सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने कहा है : "आदम की संतान मुझे कष्ट देती है। वह ज़माने को गाली देती है। जबकि मैं ही ज़माने (का मालिक) हूँ। मामला मेरे हाथ में है, मैं ही रात और दिन को पलटता हूँ।
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अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने कहा है : "आदम की संतान मुझे कष्ट देती है। वह ज़माने को गाली देती है। जबकि मैं ही ज़माने (का मालिक) हूँ। मामला मेरे हाथ में है, मैं ही रात और दिन को पलटता हूँ।"
Explanation
Benefits
अल्लाह के साथ बात एवं विश्वास में अदब का लिहाज़ रखना चाहिए।
अल्लाह की लिखी तक़दीर और उसके निर्णयों पर ईमान रखना और धैर्य के साथ उनका सामना करना ज़रूरी है।
कष्ट होना अलग चीज़ है और नुक़सान होना अलग चीज़। इन्सान को बुरी बात सुन या देखकर कष्ट होता है, लेकिन इससे उसकी कोई हानि नहीं होती। इसी तरह उसे बदबूदार चीज़ों, जैसे प्याज़ एवं लहसुन आदि से कष्ट होता है, हानि नहीं होती।।
अल्लाह को बंदों के कुछ बुरे कार्यों से कष्ट होता है, लेकिन इससे उसकी कोई हानि नहीं होती। उच्च एवं महान अल्लाह ने एक हदीस-ए-क़ुदसी में कहा है : "ऐ मेरे बंदो! तुम लोग हरगिज़ मेरे नुक़सान तक नहीं पहुँच सकते कि मेरा नुक़सान कर सको और तुम लोग हरगिज़ मेरे लाभ तक नहीं पहुँच सकते कि मेरा लाभ कर सको।"
ज़माने को गाली देने और बुरा-भला कहने के तीन प्रकार हैं : 1- ज़माने को यह सोचकर गाली देना कि वही कारक है और वही चीज़ों को अच्छा या बुरा करता है। ऐसा करना बड़ा शिर्क है। क्योंकि ऐसा करने वाला अल्लाह के साथ-साथ किसी और को रचयिता मानता है और घटनाओं की रचना को ग़ैरुल्लाह के साथ जोड़ता है। 2- ज़माने को गाली उसे कारक समझकर न दे, बल्कि कारक अल्लाह को माने, लेकिन ज़माने को गाली यह समझकर दे कि उसी में वह कार्य हुआ है, जो उसे नापसंद है। ऐसा करना भी हराम है। 3- उसका उद्देश्य बस सूचना देना हो, बुरा-भला कहना नहीं। यह जायज़ है। लूत अलैहिस्सलाम का यह कथन इसी प्रकार का है : {وَقَالَ هَذَا يَوْمٌ عَصِيبٌ} (और कहने लगे कि आज का दिन बड़ी मुसीबत का दिन है।)
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