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जिसने ख़ुद को शरई दंड का हक़दार बना लिया और उसे दुनिया में दंड दे दिया गया, तो अल्लाह का न्याय इस बात की अनुमति नहीं देता कि अपने बंदे को आख़िरत में दोबारा दंड दे।
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Hadeeth text
अली -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जिसने ख़ुद को शरई दंड का हक़दार बना लिया और उसे दुनिया में दंड दे दिया गया, तो अल्लाह का न्याय इस बात की अनुमति नहीं देता कि अपने बंदे को आख़िरत में दोबारा दंड दे। तथा जिसने ख़ुद को शरई दंड का हक़दार बना लिया और अल्लाह ने उसके इस कृत्य पर पर्दा डाल दिया तथा क्षमा कर दिया, तो अल्लाह की उदारता इस बात की अनुमति नहीं देती कि क्षमा की हुई किसी चीज़ की ओर लौटे।"
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Explanation
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि जिसने शरई दंड वाजिब करने वाला कोई गुनाह, जैसे व्यभिचार और चोरी आदि किया और दुनिया में उसे शरई दंड दे दिया गया, तो यह दंड उसके उस गुनाह को मिटा देता और आख़िरत में मिलने वाली उसकी सज़ा को ख़त्म कर देता है। क्योंकि अल्लाह का न्याय एवं दया इस बात की अनुमति नहीं देती कि बंदे को दो-दो सज़ाएँ दे। इसी तरह जिस बंदे पर अल्लाह ने दुनिया में पर्दा डाल दिया औ उसे उस गुनाह पर सज़ा नहीं दिया तथा उसके गुनाह को माफ़ कर दिया, तो अल्लाह का अनुग्रह इस बात की अनुमति नहीं देता है कि अपने माफ़ किए हुए बंदे को दोबारा सज़ा दे।
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Benefits
अल्लाह का न्याय, उदारता और दया महान है।
दुनिया में किसी गुनाह पर दिया जाने वाला शरई दंड उस गुनाह का प्रायश्चित हो जाता है।
जिसने कोई ऐसा गुनाह किया, जिसका शरई दंड निर्धारित हो और अल्लाह ने उसपर पर्दा डाल रखा हो, तो उसे भी अपने गुनाह पर पर्दा डाले रखना और अल्लाह से सच्ची तौबा करनी चाहिए।
दुनिया में किसी गुनाह पर दिया जाने वाला शरई दंड उस गुनाह का प्रायश्चित हो जाता है।
जिसने कोई ऐसा गुनाह किया, जिसका शरई दंड निर्धारित हो और अल्लाह ने उसपर पर्दा डाल रखा हो, तो उसे भी अपने गुनाह पर पर्दा डाले रखना और अल्लाह से सच्ची तौबा करनी चाहिए।
Attribution
[इस ह़दीस़ को तिर्मिज़ी और इब्न-ए-माजह ने रिवायत किया है]
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