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यदि तुम दोनों चाहो, तो मैं तुम्हें दे देता हूँ, लेकिन इसमें किसी धनी और किसी कमाने वाले शक्तिशाली व्यक्ति का कोई हिस्सा नहीं है।
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Hadeeth text
उबैदुल्लाह बिन अदी बिन अल-ख़ियार का वर्णन है, वह कहते हैं : दो आदमियों ने मुझे बताया कि वे दोनों हज्जतुल वदा के अवसर पर उस समय नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आए, जब आप सदक़ा बाँट रहे थे। चुनांचे उन दोनों ने उसमें से माँगा। इसपर आपने हमें ऊपर से नीचे तक देखा, तो हमें हट्टा-कट्टा पाया। फिर फ़रमाया : "यदि तुम दोनों चाहो, तो मैं तुम्हें दे देता हूँ, लेकिन इसमें किसी धनी और किसी कमाने वाले शक्तिशाली व्यक्ति का कोई हिस्सा नहीं है।"
02
Explanation
हज्जतुल वदा के अवसर पर दो व्यक्ति नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास उस समय आए, जब आप सदक़ा बाँट रहे थे। उन दोनों ने भी उसमें से कुछ माँगा, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उनकी हालत जानने के लिए उन्हें बार-बार देखने लगे कि क्या उन दोनों के लिए सदक़ा जायज़ है या नहीं। तो आप ल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन दोनों को शक्तिशाली पाया, अतः कहा : यदि तुम दोनों चाहो, तो मैं तुम्हें सदक़े में से दे दूँगा, लेकिन इसमें उस व्यक्ति का कोई हिस्सा नहीं है, जिसके पास अपनी ज़रूरत भर का माल हो, और न ही उस व्यक्ति का कोई हिस्सा है, जो मेहनत-मशक़्क़त करके माल कमाने पर सक्षम हो, भले ही उसके पास ऐसा माल न हो, जिससे उसे मालदार समझा जाए।
03
Benefits
धनी व्यक्ति अथवा कमाने की शक्ति रखने वाले व्यक्ति का माँगना हराम है।
जिस व्यक्ति के पास माल होने का ज्ञान न हो, वह मूल रूप से निर्धन और दान का हक़दार है।
केवल शक्ति का होना किसी को सदक़ा के अयोग्य नहीं बनाता, बल्कि उसके साथ कमाने की क्षमता का होना भी आवश्यक है।
जो व्यक्ति अपनी ज़रूरत भर कमाने में सक्षम हो, उसके लिए अनिवार्य सदक़ा लेना जायज़ नहीं है; क्योंकि वह अपनी कमाई के कारण आत्मनिर्भर है, ठीक उसी तरह, जैसे एक धनवान व्यक्ति अपने धन के कारण आत्मनिर्भर होता है।
मुस्लिम व्यक्तित्व को आत्म-सम्मान और लेने, माँगने तथा आलस्य के बजाय देने की महान नबवी शिक्षा।
जिस व्यक्ति के पास माल होने का ज्ञान न हो, वह मूल रूप से निर्धन और दान का हक़दार है।
केवल शक्ति का होना किसी को सदक़ा के अयोग्य नहीं बनाता, बल्कि उसके साथ कमाने की क्षमता का होना भी आवश्यक है।
जो व्यक्ति अपनी ज़रूरत भर कमाने में सक्षम हो, उसके लिए अनिवार्य सदक़ा लेना जायज़ नहीं है; क्योंकि वह अपनी कमाई के कारण आत्मनिर्भर है, ठीक उसी तरह, जैसे एक धनवान व्यक्ति अपने धन के कारण आत्मनिर्भर होता है।
मुस्लिम व्यक्तित्व को आत्म-सम्मान और लेने, माँगने तथा आलस्य के बजाय देने की महान नबवी शिक्षा।
Attribution
[इसे अबू दावूद तथा नसई ने रिवायत किया है]
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