मुसलमानों की माता आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) का यह कहना कि उन्होंने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से जिहाद में निकलने की अनुमति माँगी, तो आपने फ़रमायाः "तुम्हारा जिहाद हज है।"
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मुसलमानों की माता आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) कहती हैं कि उन्होंने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से जिहाद में निकलने की अनुमति माँगी, तो आपने फ़रमायाः "तुम्हारा जिहाद हज है।"
Explanation
क्योंकि सहीह हदीस में आया है कि उम्म-ए-अतिय्या कहती हैं : मैं अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ सात युद्धों में शरीक रही। मैं लोगों के युद्ध में जाने के बाद उनके ठहरने के स्थान में रहती, उनके लिए खाना बनाती, ज़ख़्मियों का उपचार करती और बीमार लोगों की देख-भाल करती थी।
आपने आगे कहा कि स्त्रियों का जिहाद हज है। हज एवं उमरा को जिहाद के समान इसलिए कहा गया है कि दोनों में यात्रा करनी पड़ती है, घर से दूर जाना पड़ता है, परिवार को छोड़ना पड़ता है, यात्राओं के खतरे झेलने पड़ते हैं, शरीर को थकाना पड़ना है और धन खर्च करना पड़ता है।
इमाम मुस्लिम ने अनस -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णन किया है कि हुनैन के दिन उम्म-ए-सुलैम -रज़ियल्लाहु अनहा- ने एक खंजर अपने पास रख लिया और अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से कहा कि मैंने इसे अपने पास इसलिए रख लिया है कि यदि कोई मुश्रिक मेरे पास आया, तो मैं उसका पेट चीर डालूँगी। यह हदीस इस बात का प्रमाण है कि स्त्रियों को भी युद्ध की अनुमति है, यद्यपि इसमें इस बात का इशारा है कि वे अपने बचाव के लिए ही युद्ध करेंगी और इसमें इस प्रकार का कोई संकेत नहीं है कि वे दुश्मन की सफ़ में जाकर उनसे मुक़ाबला के लिए सामने आने का आह्वान करेंगी।
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