افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم.
#6030[सह़ीह़]
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जब किसी महिला का पति मृत्यु को प्राप्त हो जाता तो महिला छोटे से घर में बहुत ही खराब वस्त्र पहन कर रहती, न खुश्बू लगाती न कुछ और, यहाँ तक कि एक साल बीत जाता। फिर एक जानवर- गधा अथवा चिड़या अथवा बकरी- लाया जाता और उस से अपने जिस्म को रगड़ती।

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01

Hadeeth text

उम्मे सलमा- रज़ियल्लाहु अनहा- से मरफ़ूअन वर्णित हैः एक महिला अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आई और कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! मेरी बेटी का पति मर गया है और उसकी आँख भी आई हुई है, तो क्या मैं उसकी आखों में सुरमा लगा दूँ? तो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमायाः नहीं- दो या तीन बार कहने के बाद फ़रमायाः ऐसा ही चार मास दस दिन तक करना होगा। जाहिलिय्यत में तुम में से कुछ महिला अपने ऊपर साल पूरा होने के पश्चात मेंगनी फेंका करती थी। तो ज़ैनब ने कहाः जब किसी महिला का पति मृत्यु को प्राप्त हो जाता तो महिला छोटे से घर में बहुत ही खराब वस्त्र पहन कर रहती, न खुश्बू लगाती न कुछ और, यहाँ तक कि एक साल बीत जाता। फिर एक जानवर- गधा अथवा चिड़या अथवा बकरी- लाया जाता और उस से अपने जिस्म को रगड़ती, कम ही ऐसा होता कि जिस जीव से वह अपने शरीर को रगड़ती, वह जीवित रहता। फिर वह निकलती तो उसे मेंगनी दी जाती , जिसे अपने सिर पर डाल कर फेंकती, उसके पश्चात जो सुगंध लगाना चाहती, लगाती।
02

Explanation

इसलाम ने लोगों और विशेष रूप से स्त्रियों के कंधों से जाहिलियत का बोझ उतारा है। जाहिलियत के ज़माने में लोग स्त्री जाति के साथ बुरा बर्ताव तथा उसपर अत्याचार करते थे। इसलाम ने ही उसके अधिकार की रक्षा की।
चुनांचे इस हदीस में है कि एक स्त्री अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास यह बताने के लिए आई कि उसकी बेटी के पति का निधन हो गया है और वह उसका सोग मना रही है। सोग मनाने वाली स्त्री को सिंगार से बचना होता है, लेकिन उसकी आँखों में तकलीफ़ है। ऐसे में, क्या वह आँखों में सुरमा लगा सकती है? नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः नहीं! आपने ताकीद के तौर पर इस शब्द को कई बार दोहराया।
फिर आपने चार महीना दस दिन की इस अवधि को, जो एक स्त्री अपने पति के सोग में गुज़ारती है, बहुत कम बताते हुए कहा कि क्या वह इस थोड़ी-सी अवधि में सब्र नहीं कर सकती, जिसमें कुछ आसानियाँ भी रखी गई हैं?
जाहिलियत के ज़माने में तो स्त्रियों का हाल यह था कि सोग मनाने वाली स्त्री एक छोटे-से घर में प्रवेश कर जाती और सिंगार, ख़ुशबू, पानी तथा लोगों से लोगों से मेल-जोल से दूर रहती और एक साल तक इस हाल में रहने के कारण उसके शरीर पर गंदगियाँ जम जातीं।
जब वह एक साल गुज़ार लेती, तो उसके हाथ में एक मेंगनी दी जाती, जिसे वह इस बात के संकेत के तौर फेंक देती कि उसने एक साल तक जिस परेशानी का सामना किया है, वह (उसके पति का अधिकार अदा करने की तुलना में) इस मेंगनी के बराबर भी नहीं है।
इसलाम ने इस मशक़्क़त को नेमत और इस तंगी को आसानी में बदल दिया। इसके बावजूद भी क्या वह आँख में सुरमा लगाने से बच नहीं सकती? उसे इसकी अनुमति नहीं है। ताकि यह सोग मनाने वाली स्त्री के लिए सिंगार का चोर दरवाज़ा न साबित हो।

Attribution

[इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।]

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