क़सम सामान को मार्केट में चलाने का माध्यम तो है, लेकिन कमाई की बरकत ख़त्म कर देती है।
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अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है : "क़सम सामान को मार्केट में चलाने का माध्यम तो है, लेकिन कमाई की बरकत ख़त्म कर देती है।"
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हराम की कमाई चाहे जितनी ज़्यादा नज़र आए, उसमें बरकत और भलाई नहीं होती।
क़ारी कहते हैं : कमाई की बरकत ख़त्म हो जाने का मतलब या तो धन के किसी भाग का नष्ट हो जाना है या फिर उसे ऐसे कामों में खर्च करना है, जिनका न दुनिया में कोई लाभ हो और न आख़िरत में सवाब। ऐसा भी हो सकता है कि धन तो बाक़ी रहे, लेकिन इन्सान उसके लाभ से वंचित हो जाए या फिर धन का वारिस ऐसा व्यक्ति बन जाए, जो उसे पसंद न हो।
नववी कहते हैं : इस हदीस में ख़रीद-बिक्री के समय अत्यधिक क़सम खाने से मना किया गया है। अनावश्यक क़सम खाना मकरूह है। इसमें सामान का प्रचार भी शामिल है। क्योंकि, कभी-कभी ख़रीदने वाला क़सम से धोखा खा जाता है।
बहुत ज़्यादा क़सम खाना ईमान की कमी और एकेश्वरवाद में दोष का संकेत है। क्योंकि बहुत ज़्यादा क़सम खाने से दो चीज़ें होती हैं : 1- इन्सान क़सम खाने को एक मामूली काम समझने लगता है। 2- वह झूठ बोलने लगता है। दरअसल, जो व्यक्ति बहुत ज़्यादा क़सम खाता है, वह झूठ बोलने में ज़रूर शामिल होता है। इसलिए, इंसान को बहुत कम क़सम खानी चाहिए। यही कारण है कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : {وَاحْفَظُوا أَيْمَانَكُمْ} [सूरा अल-माइदा : 89] (अपनी कसमों की हिफ़ाज़त करो।)
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