افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم.
#5831[स़ह़ीह़]
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किसी मुसलमान के लिए उचित नहीं है कि उसके पास कोई वस्तु हो, जिसकी वह वसीयत करना चाहता हो और वह वसीयतनामा लिखे बिना दो रात भी गुज़ारे।

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01

Hadeeth text

अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "किसी मुसलमान के लिए उचित नहीं है कि उसके पास कोई वस्तु हो, जिसकी वह वसीयत करना चाहता हो और वह वसीयतनामा लिखे बिना दो रात भी गुज़ारे।" अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- फ़रमाते हैं : "जबसे मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को यह फ़रमाते हुए सना है, मेरी कोई रात्रि वसीयतनामा लिखे बिना नहीं गुज़री।"
02

Explanation

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि जिस मुसलमान के पास वसीयत करने लायक़ कोई धन या अधिकार आदि हो, चाहे मामूली ही क्यों न हो, उसकी तीन रातें इस अवस्था में नहीं गुज़रनी चाहिएँ कि उसके पास वसीयत लिखी हुई न हो। अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा कहते हैं : जबसे मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से यह हदीस सुनी है, तबसे मेरी एक रात भी ऐसी नहीं गुज़री कि वसीयत मेरे पास लिखी हुई न हो।
03

Benefits

इन्सान को वसीयत करनी चाहिए और इसमें देर नहीं करनी चाहिए, इससे पहले कि कोई बाधा उसे इस कार्य से रोक दे। ताकि सब को पता रहे कि उसपर किसका क्या अधिकार है, शरई आदेश का अनुपालन हो जाए, मौत की तैयारी रहे और इन्सान वसीयत तथा वसीयत के स्थानों अवगत रहे।
वसीयत का अर्थ है वचन। यानी वह वचन, जिसके तहत कोई व्यक्ति अपनी मृत्यु के बाद किसी को अपनी कुछ संपत्ति का प्रबंधन करने, अपने छोटे बच्चों की देख-भाल करने या अपनी मृत्यु के बाद अपने स्वामित्व वाले किसी भी कार्य का प्रबंधन करने का ज़िम्मा सौंपता है।
वसीयत के तीन प्रकार हैं : 1- मुसतहब वसीयत। यानी इस बात की वसीयत करना कि उसके धन का कुछ भाग नेकी तथा परोपकार के कार्यों में ख़र्च किया जाए, ताकि मौत के बाद उसे सवाब मिलता रहे। 2- वाजिब वसीयत। यानी अपने ऊपर अनिवार्य अधिकारों के बारे में वसीयत करना। अधिकार चाहे अल्लाह के हों, जैसे ज़कात जो अदा नहीं की गई या कफ़्फ़ारा जो दिया नहीं गया, या फिर इन्सान के हों, जैसे क़र्ज़ तथा अमानतों की अदायगी। 3- हराम वसीयत। जब इन्सान अपने एक तिहाई से अधिक धन के बारे में वसीयत कर दे और किसी वारिस के हक़ में वसीयत कर दे, तो इस प्रकार की वसीयत करना हराम है।
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा की फ़ज़ीलत तथा बिना देर किए नेकी का काम एवं शरई आदेश के अनुपालन का उनका जज़्बा।
इब्न-ए-दक़ीक अल-ईद कहते हैं : दो या तीन दिनों की छूट दरअसल दिक़्क़त एवं परेशानी से बचाने के लिए दी गई है।
महत्वपूर्ण बातों को लिखकर रखना चाहिए, क्योंकि इससे अधिकारों के नष्ट होने की संभावना कम हो जाती है।

Attribution

[इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है]

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