धर्म आसान एवं सरल है और धर्म के मामले में जो भी उग्रता दिखाएगा, वह परास्त होगा। अतः, बीच का रास्ता अपनाओ, अच्छा करने की चेष्टा करो,
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अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "धर्म आसान एवं सरल है और धर्म के मामले में जो भी उग्रता दिखाएगा, वह परास्त होगा। अतः, बीच का रास्ता अपनाओ, अच्छा करने की चेष्टा करो, नेकी की आशा रखो तथा प्रातः एवं शाम और रात के अंधेरे में इबादत करके सहायता प्राप्त करो।"
Explanation
उसके बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऐसे व्यक्ति को बड़े प्रतिफल का सुसमाचार सुनाया है, जो संपूर्णतम पर अमल न कर पाने के कारण थोड़ा-सा अमल ही करता हो, उसमें निरंतरता रखता हो। क्योंकि जब विवशता में बंदे का कोई हाथ न हो, तो उससे प्रतिफल में कमी नहीं होती।
फिर चूँकि दुनिया यात्रा का स्थान है और यहीं से आख़िरत का मार्ग तय होता है, इसलिए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने चुस्ती के तीन समयों में निरंतरता के साथ इबादत द्वारा सहयोग प्राप्त करने का आदेश दिया है। ये तीन समय इस प्रकार हैं :
1- दिन के पहले भाग में चलना। दिन के पहले भाग में चलने से मुराद फ़ज्र की नमाज़ से लेकर सूरज निकलने के बीच का समय है।
2- सूरज ढलने के बाद चलना।
3- पूरी रात या रात के कुछ भाग में चलना। चूँकि रात में काम करना दिन में काम करने की तुलना में कहीं अधिक कठिन होता है, इसलिए "रात के कुछ भाग में" कहकर उसके कुछ भाग में काम करने का आदेश दिया है।
Benefits
इन्सान को कोई भी काम अपने सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए। न सुस्ती दिखे, न अति।
इन्सान को इबादत के लिए ऐसे समयों का चयन करना चाहिए, जब तबीयत में चुस्ती हो। उपर्युक्त तीन समय ऐसे हैं कि उनमें शरीर इबादत के लिए सबसे अधिक तत्पर रहता है।
इब्न-ए-हजर कहते हैं : यहाँ एक तरह से अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किसी गंतव्य की ओर यात्रा कर रहे व्यक्ति को संबोधित किया है। चूँकि इस हदीस के अंदर बयान किए गए तीन समय यात्रा के लिए सबसे उपयुक्त समय हैं, इसलिए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इन्हें चिह्नित कर दिया। क्योंकि यदि यात्री रात-दिन चलता ही रह जाए, तो कुछ दूरी तय करने के बाद थक हारकर बैठ जाएगा। इसके विपरीत अगर इन अनुकूल समयों में चले और उसके बाद आराम कर ले, तो यात्रा को जारी रखना आसान हो जाएगा।
इब्न-ए-हजर कहते हैं : इस हदीस में रुख़्सत (शरई छूट) पर अमल करने की ओर संकेत है। क्योंकि जहाँ छूट हो, वहाँ उससे फ़ायदा न उठाना अतिवाद है। मसलन किसी के लिए पानी का प्रयोग वर्जित हो और वह तयम्मुम की बजाय वज़ू करने की ज़िद पर अड़ा हुआ हो और इसकी वजह से उसका नुक़सान हो जाए, तो यही अतिवाद है।
इब्न अल-मुनैयिर कहते हैं : यह हदीस मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सच्चे नबी होने की एक बहुत बड़ी निशानी है। ख़ुद हमने और हमसे पहले के लोगों ने भी देखा है कि शक्ति से अधिक अमल का बोझ उठाने की कोशिश करने वाला हर व्यक्ति थक-हार कर बैठ जाता है। लेकिन यह भी याद रहे कि यहाँ इबादत की संपूर्णतम पद्धति अपनाने से मना नहीं किया गया है। यह तो एक सराहनीय बात है। मना अतिवाद से किया गया है, जो थक-हार कर बैठ जाने का सबब बनता है। जैसे कोई व्यक्ति रात भर तहज्जुद पढ़कर सो जाए और फ़ज्र की नमाज़ जमात के साथ अदा न कर सके या फिर सूरज निकलने तक सोया ही रह जाए।
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