“ऐ अल्लाह! मैं तुझसे जल्द तथा देर से मिलने वाली हर प्रकार की भलाई माँगता हूँ, जो मैं जानता हूँ और जो नहीं जानता। और मैं जल्द तथा देर से आने वाली हर प्रकार की बुराई से तेरी शरण चाहता हूँ, जो मैं जानता हूँ और जो नहीं जानता।
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Hadeeth text
आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनको यह दुआ सिखाई थी : “ऐ अल्लाह! मैं तुझसे जल्द तथा देर से मिलने वाली हर प्रकार की भलाई माँगता हूँ, जो मैं जानता हूँ और जो नहीं जानता। और मैं जल्द तथा देर से आने वाली हर प्रकार की बुराई से तेरी शरण चाहता हूँ, जो मैं जानता हूँ और जो नहीं जानता। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे वह भलाई माँगता हूँ, जो तेरे बंदे और तेरे नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने तुझसे माँगी है, और मैं उस बुराई से तेरी शरण चाहता हूँ जिससे तेरे बंदे और तेरे नबी ने शरण चाही है। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे जन्नत तथा उससे निकट करने वाले कार्य एवं कथन का सवाल करता हूँ, तथा मैं जहन्नम और उससे निकट कर देने वाले कार्य एवं कथन से तेरी शरण चाहता हूँ। और मैं तुझसे सवाल करता हूँ कि तूने मेरे लिए जो भी फैसला किया है, उसे बेहतर कर दे।”
Explanation
पहली दुआ : सभी अच्छाइयों के लिए आम दुआ है, (यानी): ऐ अल्लाह! मैं तुझसे सारी और तमाम भलाइयाँ माँगता हूँ, जो निकट समय से संबंध रखने वाली हैं और दूर समय से संबंध रखने वाली हैं, जो मुझको मालूम हैं तेरे सिखाने की वजह से, और जो मुझे नहीं मालूम हैं, जिन्हें बस तू ही जानता है। और इस दुआ में सभी मामलों को अल्लाह के हवाले कर दिया गया है, जो असीम ज्ञान वाला, सबसे अधिक जानकार और कृपालु है। अतः, अल्लाह तआला उस मुसलमान के लिए सबसे बेहतर और सबसे उत्तम चीज़ चुनता है। (और मैं पनाह माँगता हूँ), और मैं सहारा लेता हूँ, और मैं (आपकी शरण में रक्षा चाहता हूँ, तमाम बुराईयों से—चाहे वह जल्द आने वाली हों या देर से आने वाली हों, उन तमाम से जिन्हें मैं जानता हूँ और जिन्हें मैं नहीं जानता)।
दूसरी दुआ : ऐसी दुआ जो मुसलमान को दुआ में सीमा का उल्लंघन करने से बचाती है: यानी ऐ अल्लाह! मैं तुझसे वह भलाई माँगता हूँ, जो तेरे बंदे और तेरे नबी ने माँगी है, और मैं उस बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ, जिससे तेरे बंदे और तेरे नबी ने शरण माँगी है। इसमें अल्लाह से विनती की गई है कि वह दुआ करने वाले को वह भलाइयाँ प्रदान करे, जो अंतिम नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने ख़ुद अपने लिए माँगी हैं। आपके द्वारा माँगी गई चीज़ों को गिनवाया नहीं गया है।
तीसरी दुआ : जन्नत में प्रवेश और जहन्नम से मुक्ति की दुआ, जो मुसलमान के जीवन का उद्देश्या और उसके कर्मों का मक़सद है: ऐ अल्लाह! मैं तुझसे जन्नत माँगता हूँ और तुझे राज़ी करने वाला हर वह कथन एवं कार्य भी, जो जन्नत से क़रीब करता हो। मैं जहन्नम से तेरी शरण माँगता हूँ क्योंकि तेरी दयादृष्टि न हो, तो कोई व्यक्ति बुरे कर्मों से बच नहीं सकता और तुझे नाराज़ करने वाले हर उस गुनाह वाले कथन एवं कार्य से भी, जो जहन्नम से क़रीब ले जाता है।
चौथी दुआ : अल्लाह के हर निर्णय से संतुष्ट रहने की दुआ : मैं तुझसे विनती करता हूँ कि अपने हर निर्णय को मेरे हक़ में बेहतर बना दे और हर बात जिसको तू ने मेरे लिए निर्धारित कर दिया है मेरे हक़ में बेहतर बना दे। यह दरअसल अल्लाह के निर्णयों से संतुष्ट रहने की दुआ है।
Benefits
बेहतर यह है कि हर मुसलमान अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सिखाई हुई दुआओं को याद करके उनको पढ़ा करे। क्योंकि यह दुआएँ बड़ी सारगर्भित हुआ करती हैं।
इस हदीस के बारे में उलेमा ने कहा है कि यह अल्लाह से भलाई माँगने और बुराई से उसकी शरण माँगने के सिलसिले में सबसे सारगर्भित दुआ है। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को सारगर्भित शब्दों के चयन की जो शक्ति दी गई थी, उसका यह एक बेहतरीन नमूना है।
अल्लाह की दया के बाद जन्नत में प्रवेश का एक सबब अच्छे कार्य एवं कथन हैं।
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