मुझे कोई ऐसा कर्म बताएँ कि उसे करूँ, तो जन्नत में दाखिल हो जाऊँ। फ़रमाया : "अल्लाह की इबादत करो, किसी को उसका साझी न बनाओ, फ़र्ज़ नमाज़ कायम करो, फ़र्ज़ ज़कात अदा करो और रमज़ान के रोज़े रखो।
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अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है : एक देहाती अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया और कहा : मुझे कोई ऐसा कर्म बताएँ कि उसे करूँ, तो जन्नत में दाखिल हो जाऊँ। फ़रमाया : "अल्लाह की इबादत करो, किसी को उसका साझी न बनाओ, फ़र्ज़ नमाज़ कायम करो, फ़र्ज़ ज़कात अदा करो और रमज़ान के रोज़े रखो।" उसने कहा : उसकी क़सम जिसके हाथ में मेरी जान है, मैं इससे ज़्यादा कुछ नहीं करूँगा। जब वह वापस हुआ, तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जो किसी जन्नती व्यक्ति को देखना चाहे, वह इसे देख ले।"
Explanation
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नए-नए मुसलमान होने वाले इन्सान को पहले केवल अनिवार्य चीज़ें सिखानी चाहिए।
यह ज़रूरी है कि अल्लाह की ओर बुलाने का कार्य क्रमिक किया जाए।
इन्सान को अपने दीन की बात सीखने का उत्सुक होना चाहिए।
केवल अनिवार्य कार्यों के पालन से भी मुस्लिम व्यक्ति सफल हो जाएगा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इन्सान नफ़ल इबादतों की अदायगी में सुस्ती से काम ले। क्योंकि नफ़ल इबादतों द्वारा फ़र्ज़ इबादतों में रह जाने वाली कमियाँ दूर होती हैं।
कुछ इबादतों का ही केवल उल्लेख उनका महत्व एवं अनिवार्यता बताता है। इसका मतलब यह नहीं है कि दूसरी इबादतें अनिवार्य नहीं हैं।
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