افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم. افتتاح البرنامج الدعوي السبت القادم، ٩ / ٣ / ١٤٤٨هـ بعد صلاة الفجر مباشرة مسجد محمد بن إبراهيم، الجامعة الإسلامية بالمدينة المنورة فضيلة الشيخ د. هيثم بن محمد سرحان دورة اليوم الواحد، وختم كتاب كل سبت بإذن الله حياكم الله ونفع بكم.
#3636[स़ह़ीह़]
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मैं अपने बारे में अपने बंदे की सोच के निकट होता हूँ तथा मैं उसके साथ होता हूँ, वह जब भी मुझे याद करे।

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01

Hadeeth text

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "उच्च एवं महान अल्लाह कहता है : मैं अपने बारे में अपने बंदे की सोच के निकट होता हूँ तथा मैं उसके साथ होता हूँ, वह जब भी मुझे याद करे। अगर वह अपने मन में मुझे याद करता है, तो मैं भी उसे अपने मन में याद करता हूँ। अगर वह किसी सभा में मेरा ज़िक्र करता है, तो मैं उसका ज़िक्र ऐसी सभा में करता हूँ, जो उसकी सभा से बेहतर होती है। अगर वह मेरी ओर एक बित्ता आता है, मैं उसकी ओर एक हाथ जाता हूँ, और अगर मेरी ओर एक हाथ आता है, मैं उसकी ओर दो हाथ जाता हूँ तथा अगर मेरी ओर चलकर आता है, मैं उसकी ओर दौड़कर जाता हूँ।"
02

Explanation

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया कि उच्च एवं महान अल्लाह फ़रमाता है :

मैं वैसा ही हूँ जैसा मेरा सेवक मेरे बारे में सोचता है, चुनांचे मैं अपने सेवक के साथ उसकी उम्मीद के हिसाब से पेश आता हूँ, अर्थात माफ़ी और भलाई की उम्मीद के साथ , और मैं उसके लिए वही करता हूँ जो वह मुझसे उम्मीद करता है, चाहे अच्छा हो या बुरा, और जब वह मुझे याद करता है तो मैं दया, तौफ़ीक़, मार्गदर्शन, देखभाल और सहारे के साथ उसके साथ होता हूँ।

अगर वह एकांत में सुबहान अल्लाह एवं ला इलाहा इल्लल्लाह आदि कहकर मुझे याद करता है, तो मैं उसे एकांत में याद करता हूँ।

अगर वह मुझको लोगों के समूह में याद करता है, तो मैं उसे कहीं बड़े और पवित्र समूह के सामने याद करता हूँ।

जो अल्लाह की ओर एक बित्ता आगे बढ़ता है, अल्लाह उसकी ओर एक हाथ आगे बढ़ता है।

जो अल्लाह की ओर एक हाथ आगे बढ़ता है, अल्लाह उसकी ओर दो हाथ आगे बढ़ता है।

जो अल्लाह की ओर चलकर आता है, अल्लाह उसकी ओर दौड़कर जाता है।

सारांश यह कि जब बंदा अपने पालनहार की ओर उसकी इबादत एवं बंदगी के साथ आगे बढ़ता है, तो अल्लाह उसे अपने से और क़रीब कर लेता है, बदले के तौर जो उसके कार्य ही की तरह होता है।

बंदे की बंदगी जितनी संपूर्ण होगी, अल्लाह उससे उतना ही निकट होगा। अल्लाह बंदे को सवाब और बदला उसके अमल और कोशिश से कहीं बढ़कर देता है। कुल मिलाकर, गुणवत्ता और परिमाण के मामले में, अल्लाह का इनाम बंदे के द्वारा किए गए काम से ज़्यादा होता है।

एक मोमिन की शान यह है कि वह अल्लाह से अच्छा गुमान रखे, अमल करता रहे, नेकी के कामों में तेज़ी से आगे बढ़ता रहे और अधिक से अधिक अच्छे काम करता रहे। यह सिलसिला अल्लाह से मिलने तक जारी रखे।
03

Benefits

यह हदीस उन हदीसों में से है, जो अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अपने रब से रिवायत करके कहा है। इस तरह की हदीस को हदीस-ए-क़ुदसी या हदीस-ए-इलाही कहा जाता है। इससे मुराद वह हदीस है, जिसके शब्द तथा अर्थ दोनों अल्लाह के हों। अलबत्ता इसके अंदर क़ुरआन की विशेषताएँ, जैसे उसकी तिलावत का इबादत होना, उसके लिए तहारत प्राप्त करना तथा उसका चमत्कार होना आदि, नहीं पाई जाती।
आजुर्री कहते हैं : "सत्यवादी सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के वही गुण बयान करते हैं, जो ख़ुद अल्लाह ने बयान किए हैं, उसके रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बयान किए हैं और सहाबा रज़ियल्लाहु अनहुम ने बयान किए हैं। यही सुन्नत के अनुसरणकारी एवं बिदअत से दामन बचाने वाले उलेमा का तरीक़ा है।" अतः अह्ल-ए-सुन्नत सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के उन्हीं गुणों को साबित करते हैं, जिन्हें ख़ुद अल्लाह ने अपने लिए साबित किया है। वे इन गुणों को बतलाने वाले शब्दों के साथ न छेड़-छाड़ करते हैं, न उन्हें अर्थहीन बनाते हैं, न उन गुणों की मिसाल देते हैं और न उनकी कैफ़ियत बताते हैं। इसी तरह वे अल्लाह को उन गुणों से पाक मानते हैं, जिनसे उसने ख़ुद को पाक घोषित किया है। वे उन मामलों पर चुप रहते हैं जिनके बारे में न तो कोई पुष्टि होती है और न ही कोई खंडन। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "उसके जैसी कोई चीज़ नहीं है और वह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ देखने वाला है।"
अल्लाह के बारे में अच्छा गुमान रखने के साथ-साथ अमल की भी लाज़मी है। हसन बसरी कहते हैं : एक मोमिन अपने पालनहार के बारे में अच्छा गुमान रखता है और अच्छा अमल करता है, जबकि एक गुनाहगार अपने पालनहार के बारे में बुरा गुमान रखता है और बुरा अमल करता है।
क़ुर्तुबी कहते हैं : कुछ लोग कहते हैं : "मैं अपने बंदे के गुमान के अनुसार काम करता हूँ" से मुराद, अल्लाह के वादे पर सम्पूर्ण विश्वास रखते हुए, दुआ के समय झोली भर दिए जाने का गुमान, तौबा करते समय तौबा के क़बूल होने का गुमान, क्षमा माँगते समय क्षमा दान का गुमान और शर्तों को पूरा करते हुए इबादत करते समय प्रतिफल एवं सवाब मिलने का गुमान है। इसलिए बंदे को अपनी ज़िम्मेवारियाँ पूरी तनमयता एवं इस विश्वास के साथ अदा करनी चाहिए कि अल्लाह ग्रहण करेगा और क्षमा करेगा। क्योंकि यह उसका वादा है और वह अपना किया हुआ वादा नहीं तोड़ता। इसके विपरीत यदि किसी को विश्वास हो या लगता हो कि अल्लाह उसकी इबादत क़बूल नहीं करेगा या उसे इबादत का कोई फ़ायदा नहीं होगा, तो यह अल्लाह की दया से निराशा एवं महा पाप है। इस निराशा के साथ मरने वाले के साथ उसके गुमान के अनुसार ही व्यवहार किया जाएगा, जैसा कि इस हदीस की कुछ रिवायतों में आया है : "अतः मेरा बंदा मेरे बारे में जो गुमान रखना चाहे, रखे।" वह कहते हैं : जहाँ तक गुनाह पर क़ायम रहने के बावजूद क्षमा का गुमान रखने की बात है, तो यह मूर्खता एवं धोखा में रहना है।
ज़बान एवं दिल दोनों से अधिक से अधिक अल्लाह का ज़िक्र करने की प्रेरणा। इन्सान के दिल में अल्लाह का भय रहे, उसकी महानता एवं अधिकार का एहसास रहे, उससे आशा रहे, प्रेम रहे, अच्छा गुमान रहे, विशुद्ध रूप से उसी के लिए अमल करने की भावना रहे और ज़बान पर सुबहान अल्लाह, अल-हम्दु लिल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह, अल्लाहु अकबर और ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह जैसे अज़कार रहें।
इब्न अबू जमरा कहते हैं : जो भयाक्रांत होकर अल्लाह को याद करेगा, अल्लाह उसे शांति देगा और जो घबराए हुए अवस्था में अल्लाह को याद करेगा, अल्लाह उसकी घबराहट दूर करेगा।
अश- शिब्रू: इसे हिंदी में बित्ता कहते हैं। इससे मुराद है हथेली को फैला देने के बाद कनिष्ठा के किनारे से अंगूठे के किनारे तक की दूरी। अल-ज़िराउ: बीच वाली उंगली के किनारे से कोहनी की हड्डी के बीच की दूरी। अल-बाउ : दोनों हाथों, दोनों बाज़ुओं और सीने की चौड़ाई के बीच की दूरी। सब मिलाकर कुल चार हाथ हुआ करते हैं।

Attribution

[इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है]

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