रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपनी सवारी पर नफ़ल नमाज़ पढ़ लेते थे, चाहे वह जिधर जा रही हो। लेकिन, जब फ़र्ज़ नमाज़ पढ़ने का इरादा फ़रमाते, तो उतरकर क़िबले की ओर मुँह करके नमाज़ पढ़ते।
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Hadeeth text
जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपनी सवारी पर नफ़ल नमाज़ पढ़ लेते थे, चाहे वह जिधर जा रही हो। लेकिन, जब फ़र्ज़ नमाज़ पढ़ने का इरादा फ़रमाते, तो उतरकर क़िबले की ओर मुँह करके नमाज़ पढ़ते।
Explanation
अतः फ़र्ज़ नमाज़ को धरती पर पढ़ना ज़रूरी है। हाँ, यदि कोई शरई कारण जैसे वर्षा और शत्रु का भय आदि हो, तो फ़र्ज़ नमाज़ भी सवारी पर पढ़ी जा सकती है। इसी तरह यदि इन्सान बीमार हो, तो चारपाई पर बैठकर पढ़ सकता है। विशेष रूप से यदि नमाज़ का समय निकल जाने का भय हो, तब भी सवारी पर पढ़ सकता है। इसकी पुष्टि उन तमाम आयतों एवं हदीसों से होती है, जिनमें आसानी पैदा करना और बोझ हल्का करने की बात कही गई है। इस प्रकार की एक आयत उच्च एवं महान अल्लाह का यह फ़रमान है : "अल्लाह किसी प्राणी पर उसकी सकत (क्षमता) से अधिक (दायित्व का) भार नहीं रखता।" जबकि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जब मैं तुम्हें किसी बात का आदेश दूँ, तो जहाँ तक हो सके, उसका पालन करो।"
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