नुबूव्वत -दूतत्व- के साक्ष्य
(नुबूव्वत (दूतत्व) के साक्ष्य) और (नुबूव्वत के चिह्न)
पवित्र क़ुरआन
यह़या बिन अकस़म कहते हैं: मामून के शासनकाल में उनके पास मुनाज़रह की एक मजलिस -अर्थात विचार परिषद- थी, अतः उसमें कुछ लोगों के साथ उत्तम वस्त्र धारण किये हुये रूपवान तथा सुगंध लगाये हुये एक यहूदी आया।
वह कहते हैं किः जब उसने वार्तालाप करना आरंभ किया तो भाषा पर उसकी पकड़ का भी अंदाज़ा हुआ।
वह कहते हैं किः सभा जब समाप्त हुई तो मामून ने उसे बुलाया तथा पूछा किः क्या तुम इस्राईली अर्थात यहूदी हो ?
तो उसने कहाः हाँ।
मामून ने उससे कहाः तुम इस्लाम धर्म स्वीकार कर लो तो मैं तुम्हारे लिये यह कर दूँगा, तुम्हें यह लाभ पहुँचाऊँगा, इस्लाम स्वीकार कर लेने की स्थिति में मामून ने उससे भलाई पहुँचाने का वादा किया।
यहूदी ने कहा: बल्कि, मैं अपने धर्म तथा अपने पिता के धर्म पर चलूँगा। फिर वह चला गया।
वह कहते हैं किः एक वर्ष के पश्चात वही यहूदी हमारे पास मुसलमान के रूप में आए।
उनका कहना है किः उसने फ़िक़्ह (धर्म शास्त्र) एवं ह़दीस़ के विषय में उत्तम ढ़ंग से अपनी बात रखी, सभा जब समाप्त हुई तो मामून ने उसे बुलाया और कहाः क्या तुम वही व्यक्ति नहीं हो जिससे कुछ दिनों पहले मेरी भेंट हुई थी ?
उसने कहाः हाँ।
तो मामून ने पूछा किः तुम्हारे इस्लाम में धर्मांतरण का कारण क्या है?
यहूदी ने उत्तर देते हुये कहाः सुनें एवं अल्लाहु अकबर (अल्लाह सबसे बड़ा है) कहें, उस दिन जब मैं आपके परिषद से वापस गया तो मैंने इन धर्मों को जाँचने का इरादा बनाया, तथा मैं बड़े उत्तम ढ़ंग से लिखना जानता हूँ, अतः मैंने तौरात लेकर उसकी तीन प्रतियाँ अपने हाथों से लिखीं और उसमें अपनी ओर से कुछ कमी-वृद्धि कर दी, तथा उसे गिरजा घर में रख दिया, तो लोगों ने इसे मुझ से खरीदा और उन्होंने इसे पढ़ने या इसकी समीक्षा करने का कदापि प्रयास नहीं किया, इसके पश्चात मैंने इंजील (बाइबिल) लेकर इसकी तीन प्रतियाँ लिखीं तथा इसमें अपनी ओर जोड़-घटाव किया और इसे बीआ अर्थात सिनेगॉग (आरधनालय) में रख दिया, तो लोगों ने इसे मुझ से खरीदा और इसे पढ़ने या इसकी समीक्षा करने का कदापि प्रयास नहीं किया, इसके बाद मैंने क़ुरआन की तीन प्रतियाँ अपने हाथों से तैयार कीं और इसमें कुछ घटा बढ़ा दिया, फिर इसे काग़ज़ बेचने वालों के पास रख दिया, तो उन लोगों ने कहा किः हम इसे उस समय तक स्वीकार नहीं करेंगे जब तक इस पढ़ एवं इसकी समीक्षा न कर लें, उन लोगों ने इसकी गलतियों को पकड़ लिया तथा इसमें जोड़े एवं घटाये गये स्थानों को भी चिह्नित कर लिया, अतः उन लोगों ने उन प्रतियों को जला दिया तथा मुझे भी जान से मारने का प्रयास किया, तब मुझे पता चल गया कि यह अल्लाह द्वारा संरक्षित पुस्तक है, और यही मेरे इस्लाम धर्म स्वीकार करने का कारण बना।

